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मोदी सरकार का IT सेक्टर में बड़ा बदलाव: जानिए नए नियमों की पूरी जानकारी

भारत का डिजिटल इकोसिस्टम पिछले कुछ महीनों में बड़े बदलावों से गुजरा है। मोदी सरकार ने IT सेक्टर को लेकर दो बड़े और महत्वपूर्ण फैसले लिए हैं — पहला, डेटा प्राइवेसी को लेकर डिजिटल पर्सनल डेटा प्रोटेक्शन नियम, 2025 (DPDP Rules), और दूसरा, AI-जनित कंटेंट व डीपफेक को नियंत्रित करने के लिए IT नियम संशोधन। ये दोनों नियम भारत के डिजिटल भविष्य को नई दिशा देने वाले हैं। आइए विस्तार से समझते हैं कि इनमें क्या-क्या नया है।

1. डिजिटल पर्सनल डेटा प्रोटेक्शन नियम, 2025 (DPDP Rules)

इलेक्ट्रॉनिक्स और सूचना प्रौद्योगिकी मंत्रालय (MeitY) ने 13 नवंबर 2025 को आधिकारिक रूप से DPDP नियमों को अधिसूचित किया, जिसे 14 नवंबर 2025 को राजपत्र में प्रकाशित किया गया। यह नियम 2023 में पारित हुए डिजिटल पर्सनल डेटा प्रोटेक्शन एक्ट को पूरी तरह लागू करने के लिए बनाया गया है। यह भारत का पहला व्यापक और सिद्धांत-आधारित कानून है जो डिजिटल पर्सनल डेटा के प्रबंधन को नियंत्रित करता है।

मुख्य बातें:

  • सहमति (Consent) आधारित मॉडल: कंपनियों को अब यूज़र से डेटा लेने से पहले स्पष्ट और आसान भाषा में सहमति लेनी होगी। सहमति वापस लेना भी उतना ही आसान होना चाहिए जितना देना।
  • डेटा प्रोटेक्शन बोर्ड ऑफ इंडिया: एक पूरी तरह डिजिटल बोर्ड बनाया गया है, जिसमें 4 सदस्य होंगे। नागरिक ऑनलाइन शिकायत दर्ज कर सकेंगे और पोर्टल व मोबाइल ऐप के जरिए अपने केस को ट्रैक भी कर सकेंगे।
  • कड़ा जुर्माना: डेटा ब्रीच की रिपोर्टिंग में चूक होने पर कंपनियों पर 200 करोड़ रुपये तक का जुर्माना लगाया जा सकता है।
  • महत्वपूर्ण डेटा फिड्युशियरी (SDF): बड़ी मात्रा में या संवेदनशील डेटा प्रोसेस करने वाली कंपनियों को SDF के रूप में चिन्हित किया जा सकता है, जिन्हें हर 12 महीने में डेटा प्रोटेक्शन इम्पैक्ट असेसमेंट और ऑडिट कराना अनिवार्य होगा।
  • बच्चों और दिव्यांगजनों की सुरक्षा: बच्चों और विशेष सुरक्षा की जरूरत वाले लोगों के डेटा के लिए अतिरिक्त सुरक्षा प्रावधान रखे गए हैं।
  • डेटा रिटेंशन: प्रोसेसिंग से जुड़े लॉग और पर्सनल डेटा को कम से कम 1 साल तक सुरक्षित रखना अनिवार्य है, जब तक कानून में अलग समय-सीमा न बताई गई हो।

लागू होने की समय-सीमा (Phased Implementation):

नियम एक साथ लागू नहीं होंगे, बल्कि तीन चरणों में लागू किए जाएंगे:

  1. चरण 1 (13 नवंबर 2025): डेटा प्रोटेक्शन बोर्ड ऑफ इंडिया की स्थापना।
  2. चरण 2 (13 नवंबर 2026): कंसेंट मैनेजर्स के रजिस्ट्रेशन की प्रक्रिया शुरू होगी। ये वे संस्थाएं होंगी जो यूज़र्स की तरफ से सहमति देने, प्रबंधित करने और वापस लेने में मदद करेंगी।
  3. चरण 3 (13 मई 2027): मुख्य अनुपालन दायित्व — जैसे नोटिस, सुरक्षा प्रोटोकॉल, ब्रीच नोटिफिकेशन और SDF से जुड़ी बाध्यताएं — पूरी तरह लागू हो जाएंगी।

इस दौरान, MeitY ने दिल्ली, मुंबई, गुवाहाटी, कोलकाता, हैदराबाद, बेंगलुरु और चेन्नई में कई परामर्श सत्र आयोजित किए, जिनमें स्टार्टअप्स, MSME, उद्योग संगठनों और नागरिकों से करीब 6,915 सुझाव प्राप्त हुए।

2. AI-जनित कंटेंट और डीपफेक पर नकेल: IT नियम संशोधन

देश में डीपफेक और AI-जनित फर्जी कंटेंट के बढ़ते खतरे को देखते हुए, MeitY ने सूचना प्रौद्योगिकी (इंटरमीडियरी दिशा-निर्देश और डिजिटल मीडिया आचार संहिता) नियम, 2021 में संशोधन का प्रस्ताव 22 अक्टूबर 2025 को रखा, जिस पर स्टेकहोल्डर्स से 6 नवंबर 2025 तक सुझाव मांगे गए। इसके बाद 2026 में अंतिम संशोधित नियम अधिसूचित किए गए।

इन नियमों में क्या खास है:

  • “सिंथेटिकली जनरेटेड इंफॉर्मेशन (SGI)” की परिभाषा: पहली बार कानून में यह परिभाषित किया गया है कि कोई भी सूचना जो कंप्यूटर संसाधन के माध्यम से कृत्रिम रूप से बनाई, बदली या परिवर्तित की गई हो, और असली या सच जैसी दिखती हो, उसे SGI कहा जाएगा। यह परिभाषा तकनीक-निरपेक्ष है, यानी सिर्फ AI तक सीमित नहीं है।
  • अनिवार्य लेबलिंग: जो भी इंटरमीडियरी (प्लेटफॉर्म) कंटेंट बनाने के टूल उपलब्ध कराते हैं, उन्हें ऐसे कंटेंट पर स्पष्ट और आसानी से पहचाने जाने वाला लेबल लगाना अनिवार्य होगा। शुरुआती ड्राफ्ट में विजुअल कंटेंट के लिए स्क्रीन के कम से कम 10% हिस्से पर लेबल और ऑडियो में शुरुआती 10% हिस्से में डिस्क्लेमर देने की शर्त रखी गई थी, लेकिन अंतिम नियमों में यह फिक्स्ड प्रतिशत हटाकर “स्पष्ट और प्रमुखता से दिखने वाला” लेबल अनिवार्य किया गया।
  • मेटाडेटा और ट्रेसेबिलिटी: जहां तकनीकी रूप से संभव हो, कंटेंट में स्थायी मेटाडेटा या यूनिक आइडेंटिफायर जोड़ना होगा, ताकि यह पता लगाया जा सके कि कंटेंट किस कंप्यूटर संसाधन से बना।
  • सिग्निफिकेंट सोशल मीडिया इंटरमीडियरी (SSMI) पर अतिरिक्त जिम्मेदारी: बड़े सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म्स को यूज़र्स से यह घोषणा करवानी होगी कि अपलोड किया गया कंटेंट सिंथेटिक है या नहीं, और उचित तकनीकी उपायों से इसकी पुष्टि भी करनी होगी।
  • तेज़ टेकडाउन प्रक्रिया: शिकायत मिलने पर पहले से कम समय-सीमा में कंटेंट हटाने की बाध्यता रखी गई है।
  • छूट: सामान्य और सद्भावनापूर्ण एडिटिंग जैसे फॉर्मेटिंग, रंग सुधार, ट्रांसक्रिप्शन या कंप्रेशन को इस दायरे से बाहर रखा गया है, ताकि आम क्रिएटिव कंटेंट प्रभावित न हो।
  • 10 दिन का अनुपालन समय: नियम लागू होने के बाद इंटरमीडियरीज़ को तकनीकी और परिचालन बदलाव करने के लिए 10 दिन का समय दिया गया है।

गौरतलब है कि उल्लेखनीय है कि टेक्स्ट-आधारित AI कंटेंट फिलहाल SGI की परिभाषा में शामिल नहीं है, हालांकि गैरकानूनी टेक्स्ट कंटेंट पर मौजूदा IT नियम पहले से लागू होते हैं।

इन नियमों का असर

इन दोनों नियमों का सीधा असर भारत की टेक कंपनियों, स्टार्टअप्स, सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म्स और आम यूज़र्स — सभी पर पड़ेगा:

  • कंपनियों के लिए: अब उन्हें डेटा सुरक्षा को लेकर 24×7 इंसिडेंट रिस्पॉन्स सिस्टम बनाना होगा और डेटा प्रोसेसर्स के साथ सख्त कॉन्ट्रैक्ट क्लॉज़ रखने होंगे।
  • सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म्स के लिए: AI कंटेंट की पहचान, लेबलिंग और तेज़ टेकडाउन की नई तकनीकी व्यवस्था बनानी होगी।
  • आम नागरिकों के लिए: अपने डेटा पर ज्यादा नियंत्रण मिलेगा और नकली या भ्रामक AI कंटेंट को पहचानना आसान होगा।

साथ ही, बजट 2026-27 में भी IT सेक्टर के लिए कई राहत भरे ऐलान हुए — जैसे सॉफ्टवेयर, IT-सक्षम सेवाओं और KPO सेवाओं को एक ही टैक्स श्रेणी में लाना, और ट्रांसफर प्राइसिंग के लिए सेफ हार्बर सीमा को 300 करोड़ से बढ़ाकर 2,000 करोड़ रुपये करना — जिससे क्लाउड और डेटा सेंटर निवेश को बढ़ावा मिलने की उम्मीद है।

निष्कर्ष

मोदी सरकार के ये दोनों कदम भारत के डिजिटल भविष्य के लिए बेहद महत्वपूर्ण साबित होने वाले हैं। एक तरफ जहां DPDP नियम नागरिकों की डेटा प्राइवेसी को मजबूत करते हैं, वहीं IT नियम संशोधन डीपफेक और AI के दुरुपयोग पर लगाम कसने का प्रयास है। हालांकि, कुछ नागरिक संगठनों ने इन नियमों में पारदर्शिता और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता को लेकर चिंताएं भी जताई हैं। कुल मिलाकर, आने वाले महीनों में जैसे-जैसे ये नियम पूरी तरह लागू होंगे, भारत का डिजिटल इकोसिस्टम एक नए, अधिक जवाबदेह और सुरक्षित स्वरूप में ढलता नजर आएगा।

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